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फसलों के चयन में सावधानी के साथ-साथ खेती के तौर-तरीकों में भी बदलाव




 किसानों को फसलों के चयन में समझ-बूझ के साथ काम लेना चाहिए। 

टिन्डे की फसल जिसमें बाजरे और गेहूं से तीन गुना ज्यादा आमदनी 

 फूलों की भी खेती सबसे ज्यादा आमदनी 

बेबीकार्न की खेती की

फसलों के चयन में सावधानी के साथ-साथ खेती के तौर-तरीकों में भी बदलाव 

 रासायनिक खाद (उर्वरक) का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं खाद के तौर पर मैं केंचुआ खाद व गोबर खाद का ही

किस मौसम में कौन सी फसल की खेती करनी है, यह तय करने के पहले जमीन की गुणवत्ता और पानी की उपलब्धता के साथ-साथ बाजार की मांग 

केंचुआ खाद :

केंचुआ किसान के सबसे अच्छे मित्रें में से एक है।

 एक किलो केंचुआ वर्ष भर में 50-60 किलो केंचुआ पैदा कर सकता है। केंचुआ खाद बनाने में खेती के सारे बेकार पदार्थों, जैसे डंठल, सड़ी घास, भूसा, गोबर, चारा आदि का प्रयोग हो जाता है। सब मिलाकर केंचुए से 60-70 दिनों में खाद तैयार हो जाती है। इस खाद की प्रति एकड़ खपत यूरिया की अपेक्षा एक चौथाई है। इसके प्रयोग से मिट्टी को नुकसान भी नहीं पहुंचता है। फसल की उत्पादकता भी 20-30 प्रतिशत बढ़ जाती है। केंचुआ खाद बनाने पर यदि किसान ध्यान दें तो वे अपने खेतों में प्रयोग करने के बाद इसे बेच भी सकते हैं। यह किसान भाईयों के लिए आमदनी का एक अतिरिक्त स्रोत भी हो सकता है।

मशरूम खेती :

मशरूम का 80 हजार करोड़ का बाजार है। जहां धान की फसल होती है, वहां इसकी खेती की संभावनाएं सबसे अधिक होती हैं क्योंकि इसकी खेती में पुआल का विशेष रूप से प्रयोग होता है। फसल लेने के बाद बेकार बचे हुए पदार्थों को 

केंचुआ खाद में बदल कर 60-70 दिनों में 

तालाब एवं मछली पालन :

खेत के सबसे नीचे कोने को तालाब 

 जिसमें बरसात का सारा पानी इकट्ठा होता है और डेरी का सारा व्यर्थ पानी भी चला जाता है।

 डेरी के पानी में मिला गोबर आदि मछलियों का भोजन बन जाता है। इससे उनका विकास दोगुना हो जाता है। 
 मछलीपालन के अलावा तालाब में कमल ककड़ी, मखाना आदि

बहुफसलीय खेती :

एक साथ तीन से चार फसल 

 ऐसा करते समय - समय, तापमान और मेल का विशेष ध्यान

उदाहरण स्वरूप सितंबर माह के अंत में मूली की बुवाई हो जाती है जिसके साथ गेंदा फूल भी लगा दे

 अक्टूबर में निकाल ले

 नवंबर के शुरूआत में पालक या तोरी आदि लगा दे

जिसकी कटाई दिसंबर में हो जाती है। वहीं फूलों से आमदनी जनवरी से शुरू हो जाती है।

केले की खेती :

केले की खेती से जमीन में केंचुओं की संख्या बहुत ज्यादा हो जाती है। केला एक ऐसा पौधा है जो खराब एवं पथरीली जमीन को भी कोमल मिट्टी में तब्दील कर देता है। इसके प्रभाव से किसी भी फसल की उत्पादकता 25 से 30 प्रतिशत बढ़ जाती है। केले की जैविक खेती करने से पौधे सामान्य से ज्यादा ऊंचाई के होते हैं। गर्मी में केलों के बीच में ठंडक रहती है इसलिए इसमें फूलों की भी खेती हो जाती है, जिससे 15-20 हजार रुपए की अतिरिक्त आमदनी हो जाती है। गर्मी के दिनों में मधुमक्खी के बक्सों को रखने के लिए भी यह सबसे सुरक्षित स्थान होता है।

वृक्षारोपण :

खेतों की मेड़ों पर  पेड़ 
 

मधुमक्खी पालन :

मधुमक्खी से भरे एक बक्से की कीमत लगभग चार हजार रुपए होती है।  खेती में मधुमक्खियों की विशेष भूमिका है।  शहद उत्पादन के अलावा भी इनके कई फायदे हैं। फूलों की पैदावार में इनसे 30 से 40 प्रतिशत और तिलहन-दलहन की पैदावार में लगभग 10 से 20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो जाती है। बेहतर परागण के कारण फसलें भी एक ही समय पर पकती हैं। इस क्षेत्र में खादी ग्रामोद्योग एवं कई अन्य संस्थाएं सहायता कर रही हैं।
 

मधुमक्खी पालन :

मधुमक्खियों के बक्सों से हम शुरुआत करते हैं। एक ही साल में इनकी संख्या दोगुनी हो जाती है। 

डेरी:

एक छोटी सी डेरी से लगभग 60-70 हजार की सीधी आय होती है।

मछली पालन :


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